“विधवा होना अभिशाप नहीं, नेतृत्व का एक नया अध्याय है!” – ‘भारतीय विधवा महिला उत्थान फाउंडेशन’ का नागपुर में शंखनाद!

जिला प्रतिनिधि- नागपुर

आज नागपुर में एक ऐसी मुलाकात हुई जो समाज में विधवा महिलाओं की बदलती तस्वीर की गवाह है। ‘भारतीय विधवा महिला उत्थान फाउंडेशन’ की राष्ट्रीय सचिव, रूपाली यादोराव ऊके ने राकांपा (शरदचंद्र पवार गुट) की नागपुर जिला अध्यक्ष, श्रीमती प्रिया संकेत फुके के साथ एक अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक बैठक की।
यह मुलाकात विधवा महिलाओं के उस कठिन संघर्ष को समर्पित रही, जो उन्हें समाज में सम्मान के साथ जीने के लिए करना पड़ता है। फाउंडेशन की कार्यकारिणी अध्यक्ष, अड. सुमन सेहरावत जी के विज़न को आगे बढ़ाते हुए, इस बैठक में महिलाओं के सशक्तिकरण पर गहन चर्चा हुई।
संघर्ष की गाथा:
बैठक के दौरान उन परिस्थितियों पर चर्चा हुई, जब जीवनसाथी को खोने के बाद का जीवन एक कठिन परीक्षा की तरह सामने आता है। एक महिला जब अपना जीवनसाथी खोती है, तो उसे समाज की नज़रों के साथ-साथ उन तमाम दुश्वारियों से लड़ना पड़ता है जो उसके सामने खड़ी हो जाती हैं। प्रिया जी ने उस दौर का सामना जिस मजबूती और संयम के साथ किया है, वह हर उस बहन के लिए मिसाल है जो अकेले संघर्ष की आग में तप रही है।
प्रिया संकेत फुके जी के विचार:
अपने अनुभव साझा करते हुए प्रिया जी ने कहा—
“असल लड़ाई तो अपने भीतर की उस टूटन को जोड़कर खुद को खड़ा करने की होती है। मैंने जिस मजबूती से हर दिन का सामना किया, वह मेरे लिए एक सीख रही है। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो मुझे एहसास होता है कि हर विधवा बहन में एक अपार शक्ति छिपी है। किसी भी बहन को यह नहीं भूलना चाहिए कि उनका अस्तित्व किसी के नाम का मोहताज नहीं है, वे स्वयं अपनी पहचान हैं।”
रूपाली यादोराव ऊके (राष्ट्रीय सचिव) का संकल्प:
रूपाली जी ने प्रिया जी के साहस को नमन करते हुए कहा, “प्रिया जी ने जिस तरह अपनी विषम परिस्थितियों को हराकर आज नागपुर के नेतृत्व की कमान संभाली है, वह यह साबित करता है कि विधवा होना जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली शुरुआत है। फाउंडेशन का लक्ष्य यही है कि हम हर उस बहन को यह अहसास दिलाएं कि वे अकेली नहीं हैं। हमारा हर कदम उन विधवा महिलाओं की ताकत बनकर उभरेगा, जो समाज की तमाम बाधाओं को पार करके अपने स्वाभिमान के साथ जीना चाहती हैं।”
एक स्पष्ट संदेश:
आज यह महा-संवाद इस बात का प्रतीक है कि विधवा बहनें अब केवल सहानुभूति का पात्र नहीं, बल्कि समाज के ‘नेतृत्व का आधार’ हैं। हम ऐसी व्यवस्था बना रहे हैं जहाँ हर बहन गर्व के साथ अपना सिर उठाकर चल सके।
“हम आंसू नहीं, आत्मविश्वास बाँटने निकले हैं!”

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