
भोरमदेव, छत्तीसगढ़ के कवर्धा (कबीरधाम) जिले में स्थित एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक मंदिर

जिलाप्रतिनिधि:- सपना सोनवानी, कवर्धा (छत्तीसगढ़) 30 Dec
कवर्धा:- नए साल के अवसर पर 01 जनवरी 2026 को मंदिर व प्राकृतिक नजारा देखने के लिए पहुचेंगे हजारों पर्यटक व श्रद्धालु! भोरमदेव मंदिर छत्तीसगढ के कबीरधाम जिले में कबीरधाम से 18 कि॰मी॰ दूर तथा रायपुर से 125 कि॰मी॰ दूर चौरागाँव में एक हजार वर्ष पुराना मंदिर है। मंदिर के चारो ओर मैकल पर्वतसमूह है जिनके मध्य हरी भरी घाटी में यह मंदिर है। मंदिर के सामने एक सुंदर तालाब भी है। इस मंदिर की बनावट खजुराहो तथा कोणार्क के मंदिर के समान है जिसके कारण लोग इस मंदिर को ‘छत्तीसगढ का खजुराहो’ भी कहते हैं।
यह मंदिर एक एतिहासिक मंदिर है। इस मंदिर को 11वीं शताब्दी में नागवंशी राजा गोपाल देव ने बनवाया था। ऐसा कहा जाता है कि गोड राजाओं के देवता भोरमदेव थे एवं वे भगवान शिव के उपासक थे। भोरमदेव , शिवजी का ही एक नाम है, जिसके कारण इस मंदिर का नाम भोरमदेव पडा। 
भोरमदेव, छत्तीसगढ़ के कवर्धा (कबीरधाम) जिले में स्थित एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक मंदिर और वन्यजीव अभयारण्य है, जिसे ‘छत्तीसगढ़ का खजुराहो’ भी कहते हैं. यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और अपनी नागर शैली की वास्तुकला, खूबसूरत नक्काशी और < कामुक मूर्तियों के लिए जाना जाता है, जो इसे खजुराहो मंदिरों जैसा रूप देती हैं. यह मंदिर 7वीं से 11वीं शताब्दी के बीच बना था और आसपास की प्राकृतिक सुंदरता इसे एक प्रमुख पर्यटन स्थल बनाती है, जिसके पास ही एक खूबसूरत तालाब और वन्यजीव अभयारण्य भी है। 
भोरमदेव अभयारण्य वर्ष 2001 में अधिसूचना हुआ। तब नए राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ का गठन हुआ था। चिल्फी घाटी के साथ ही कान्हा नेशनल पार्क का भी एक बढ़ा बफर जोन नवगठित छत्तीसगढ़ राज्य में आ गया। चूँकि भोरमदेव और चिल्फी का यह क्षेत्रकान्हा नेशनल पार्क और अचानकमार के बीच पहले से ही एक कारीडोर के रूप में था।
वन्यप्राणी की आवाजाही इधर से ही होती रही है। इसलिए वन्य प्राणियों की प्रजातियों में भी स्वाभाविक रूप से समानता पायी जाती है। इसका नामकरण भी यहाँ छत्तीसगढ़ का खजुराहो नाम से प्रतिष्टित भोरमदेव मंदिर के नाम पर ही अधिसूचित किया गया । 
भोरमदेव मंदिर अभयारण्य का विस्तार 800 53′ पूर्वी अक्षांश से 810 10′ अक्षांश और 210 54′ उत्तरी देशान्तर से 220 15′ के बीच है। उत्तर में इसका विस्तार डिंडौरी जिला की दक्षिणी सीमा तक है तो दक्षिण में मण्डलाकोंन्हा गाँव की उत्तरी सीमाओं को छूती है। इसीतरह पालक गाँव से छपरी गाँव की पश्चिमी सीमा अभ्यारण्य की पूर्वी सीमा होती है, तो पश्चिम में यह अभयारण्य कान्हा राष्ट्रीय उद्यान की पूर्वी सीमा पर स्थित बालाघाट जिले के पाचवा गाँव तक विस्तारित है। 
मुख्य विशेषताएँ:
समर्पण: भगवान शिव को समर्पित.
नाम: “छत्तीसगढ़ का खजुराहो”.
शैली: नागर शैली, खजुराहो और कोणार्क मंदिरों की झलक.
निर्माण: 7वीं से 11वीं शताब्दी (नागवंशी राजाओं द्वारा).
स्थान: कवर्धा से 18 किमी दूर चौरागांव में, मैकल पर्वत श्रृंखला के बीच.
वास्तुकला: पांच फीट ऊँचे चबूतरे पर निर्मित, सुंदर खंभों और मिथुन मूर्तियों से सुसज्जित.
आसपास: एक तालाब और भोरमदेव वन्यजीव अभयारण्य.
भोरमदेव वन्यजीव अभयारण्य:
यह मंदिर के नाम पर ही अधिसूचित किया गया है, जो कान्हा राष्ट्रीय उद्यान और अचानकमार टाइगर रिजर्व के बीच एक गलियारे के रूप में कार्य करता है.
नवंबर से मार्च के बीच घूमने के लिए सबसे अच्छा समय है.
कुल मिलाकर, भोरमदेव कला, इतिहास और प्रकृति का एक अद्भुत संगम है जो पर्यटकों और श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।
(“ग्रामीण क्षमता न्यूज” यूट्यूब पर अवश्य देखें।)
खबर व विज्ञापनों के लिए संपर्क करें- न्यूज रिपोर्टर- सपना सोनवानी, मोबाईल-7869988756 जिला कवर्धा!
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